कहानी — छोटी छोटी बातें | लेखक - मधुलता अरोरा

 यह अलार्म भी अजीब है, कभी बजना नहीं भूलता। शुभि घड़ी देखती है। अभी पाँच ही बजे हैं। कुछ सोचकर उठती है, फ्रिज में से ठंडी रुई निकालती है, आँखों पर रखकर फिर लेट जाती है। कुछ समय बाद अलार्म फिर घर्रा उठता है। अब कोई चारा नहीं। उठना ही पड़ेगा।



 

आज शुभि अपने शरीर में भारीपन महसूस कर रही है। पूरा बदन अलसा रहा है। कोई भी काम करने का मन नहीं कर रहा है। लेकिन बलि का बकरा कब तक खैर मनाएगा। हर रात यह सोचकर सोती हे कि तड़के पाँच बजे सैर पर जाएगी, आकर नींबू की चाय पिएगी, बेटे का नाश्‍ता और टिफिन बनाएगी। साढ़े छह बजे बेटे को स्‍कूल रवाना करके कंप्‍यूटर पर अपने पत्र वगैरह देखेगी। समाचार पत्र में भविष्‍य पढे़गी कि आज का दिन कैसे बीतेगा और हिसाब से मूड बनाकर दफ़्तर की तैयारी करेगी। बाकी तो सारे काम हो जाते हैं। बस, रह जाती है पाँच बजे की सैर और नींबू की चाय।

दरअसल आजकल शुभि का रूटीन कामों में दिल नहीं लगता। उसे ज़िन्‍दगी में कुछ हटकर काम करने की इच्‍छा होती है, पर वह क्‍या करना चाहती है, इसी उलझन में उलझी रहती है। बेशक वह नौकरीपेशा है, पर दफ़्तर में भी तो घिसा पिटा काम।

और फिर वक्‍त की कमी, बेटे की पढ़ाई। उसे अक्‍सर दफ़्तर में दिनभर से छूटे बेटे की याद आती है कि वह उसकी राह तक रहा होगा और यही याद, बेटे का मोह उसे शाम साढ़े पाँच बजे घर की तरफ़ दौड़ा देता है। घर आकर बेटे का हालचाल पूछती है और बेटा निश्चिंत होकर खेलने चला जाता है।

शुभि दिनभर की भागदौड़ को दस मिनट लेटकर दूर करने की कोशिश करती है। आँखें बन्‍द ही करती है कि दरवाज़े की घंटी बज उठती है। दरवाज़ा खोलते ही छोटे-छोटे बच्‍चे 'पानी, पानी' की रट लगाते हुए घर में घुस आते हैं। शुभि को छोटे बच्‍चे बहुत अच्‍छे लगते हैं। उसके थके चेहरे पर एक मुसकान आती है और बच्‍चों को ताँबे के बर्तन से पानी पिलाती है और साथ में हाजमोला की गोली देती है जिस पर बच्‍चों की नज़र टिकी होती है। बच्‍चे खिलखिलाते हुए चले जाते हैं। अभी वह फिर लेटने को हुई ही है कि घंटी फिर घनघनाने लगती है। दरवाजे़ को खोलते ही धोबी दिखता है और पूछता है, ''भाभी, कपड़े हैं?'' प्रेस के लिए कपड़े होते हुए भी वह मना कर देती है। धोबी मुस्‍कराता हुआ चला जाता है। उसे पता है कि भाभी का मूड नहीं है। कल एक गठरी पकड़ा देंगी और कै़फियत देंगी कि कल मूड नहीं था कपड़े गिनने का।

आज रविवार है। शुभि ने तय किया है कि आज कुछ काम नहीं करेगी। आराम और सिर्फ़ आराम करेगी। आज खुद का विश्‍लेषण भी करेगी कि आखिर वह ज़िन्‍दगी में और ज़िन्‍दगी से क्‍या चाहती है? गौर करती है कि शादीशुदा ज़िन्‍दगी रफ़्ता-रफ़्ता चल ही रही है। उसके पति प्रणव एक प्रतिष्ठित संस्‍थान में ऊँचे पद पर कार्यरत हैं, लेखक हैं। उनकी अपनी व्‍यस्‍तताएँ हैं। उनके जीवन की प्राथमिकताएँ अलग हैं। शुभि शादी के बाद लगातार घर परिवार की ज़िम्‍मेदारियों को निभाने व रिश्‍तेदारों को निभाने में व्‍यस्‍त रही।

शादी के बाद के शुरुआती दिनों में रिश्‍तेदार मुंबई घूमने आते रहे और वह नौकरी करते हुए, छोटे बच्‍चों को सँभालते हुए उन लोगों को चकरघिन्‍नी की तरह मुंबई दर्शन कराती रही। धीरे-धीरे प्रणव के लेखक दोस्‍त घर में आने लगे। उनके सम्‍मान में घर में गोष्ठियाँ होतीं। शुभि को यह परिवर्तन रास आने लगा। उसे यह सुकून होता कि ये रिश्‍तेदार नहीं हैं। ये दोस्‍त हैं, इनके प्रति कोई दायित्‍व नहीं है। यदि मूड हुआ तो घर में कुछ बना लेगी अन्‍यथा बाज़ार से मँगवा लिया जाएगा।

इन साहित्यिक गोष्ठियों में शुभि का मन ऐसा रमा कि उसे अपने लिए अलग से मित्रों की ज़रूरत ही महसूस नहीं हुई। प्रणव के सारे मित्र उसके अपने हैं, ऐसा वह समझती थी। प्रणव भी संतुष्ट थे कि शुभि कभी किसी मित्र का अनादर नहीं करती, बढ़िया मेज़बानी करती है। प्रणव इस बात से आश्‍वस्‍त थे कि उनके घर में दोस्‍तों का कभी अनादर नहीं होगा। मज़ाक में एक मित्र ने कह भी दिया था कि जिस घर में आगत का सम्‍मान घर की महिला नहीं करती, वहाँ कोई नहीं जाता। यह सुनकर शुभि को स्‍वयं पर गर्व महसूस हुआ और यह आश्‍वस्ति भी हुई कि प्रणव की कभी किसी दोस्‍त से खटकेगी तो वह 'निमित्‍त' नहीं होगी। सच कहा जाए तो शुभि को औरतों की टुच्‍ची बातों में शुरू से ही कोई रुचि नहीं रही है। उनकी बातों का दायरा साड़ी, गहनों, अफेयरों, खाने की रेसिपी से आगे बढ़ ही नहीं पाया है चाहे वे स्‍वतंत्र मानसिकता का कितना भी दावा क्‍यों न करती हों।

आज शुभि पूरे आराम के मूड में है। छुटटी के दिन उसे बिस्‍तर पर लेटकर कमरे की छत और घूमते पंखे को देखना बहुत अच्‍छा लगता है। तब वह अपनी दुनिया में होती है, उस दुनिया में उसे किसी का प्रवेश स्‍वीकार्य नहीं है, यहाँ तक कि पति प्रणव का भी। प्रणव चकित होते हैं कि शुभि की ऐसी कौन-सी दुनिया है जहाँ उनका भी प्रवेश वर्जि़त है। अब शुभि प्रणव को कैसे समझाए कि वह अपनी ज़िन्‍दगी में अपने लिए पूरा स्‍पेस चाहती है। उस स्‍पेस में उसे किसी की दख़ल-अन्‍दाज़ी पसन्‍द नहीं है। शुभि के अन्‍दर एक कमी है कि वह बिना सोचे समझे निष्‍पाप मन से प्रणव के दोस्‍तों से हँस बोल लेती है और कभी-कभी किसी दोस्‍त के लिए सीमा से बाहर जाकर कुछ काम भी कर देती है तो प्रणव बड़ा अजीब-सा महसूस करते हें। शुभि को इसमें कुछ भी अजीब नहीं लगता। वह शुरू से ही मुंबई जैसे शहर में रह रही है और ऊपर से नौकरीपेशा है सो उसकी सोच बहुत ही खुली हुई है।

मायके में बड़ी होने की वजह से उसे ज़िम्‍मेदारी लेने और निभाने की आदत है। उसे किसी की मदद करना अच्‍छा लगता है और आत्‍मसंतुष्‍टि भी देता है। उसे कई बार आश्‍चर्य होता है कि इसी स्वभाव के कारण प्रणव उसकी तरफ़ आकर्षित हुए थे और अब इसी स्वभाव से चिढ़ क्‍यों? क्‍या पुरुष पति बनते ही इतना आत्‍मकेन्‍द्रित हो जाता है कि पत्‍नी सिर्फ़ उसके लिए ही सब कुछ करे? इसी बात पर प्रणव से खासी बहस हो जाती है। शुभि बड़े प्‍यार से प्रणव को समझाती है कि उसे मायके से बेशक दहेज नहीं मिला है पर एक चीज़ ज़रूर विरासत में मिली है कि घर आए का कभी अनादर मत करो। जिस काम में सुख मिलता है वह ज़रूर करो। ज़िन्‍दगी में हर किसी को खुश रखने के लिए खुद को दुखी मत करो। अब शुभि इस रास्‍ते पर चलने की अभ्‍यस्‍त हो गई है और इसके बिना उसे क़रार नहीं।

कई बार शुभि के साथ ऐसा भी हुआ है कि अपना समझनेवालों का काम वह हँसते-हँसते कर देती है और बाद में वे ही लोग उसका मज़ाक उड़ाते हैं। शुभि को ऐसे लोगों की मानसिकता और शातिरपने पर बड़ी कोफ़्त होती है। शुभि के लिए यही छोटी-छोटी बातें पहाड़ बनकर सामने खड़ी हो जाती हैं। उसे समझ नहीं आता कि आखिर वह करे तो क्‍या करे? खुद पर खीझती भी है कि वह इतनी सिर्री क्‍यों है? क्‍यों अपने मन की बात किसी को बताती है? दरअसल शुभि अपनी मासूमियत के कारण कभी खुद की वजह से तो कभी दूसरों की वजह से स्वयं को ऐसे मकड़जाल में उलझा लेती है कि उससे बाहर निकलना मुश्‍किल हो जाता है। वह चाहकर भी खुदगर्ज़ व मतलबपरस्‍त नहीं बन पाई है। उसके इस स्‍वभाव का लोग फ़ायदा उठाते हैं, शुभि इससे परिचित है, पर उसे लगता है कि वह अपने उस स्वभाव को क्‍योंकर बदले जो उसे सुकून देता है। बस, फिर सिर झटककर उन अनर्गल बातों को भूलकर अपनी दिनचर्या में रम जाती है।

उसने ज़िन्‍दगीभर सभी स्‍थितियों से समझौता किया है ताकि घर में शान्‍ति बनी रहे। उसे लड़ाई झगड़ों, व्‍यर्थ की बहसों से बहुत डर लगता है। ऊँची आवाज़ से उसके कान की लवें और आँखें गर्म हो जाती हैं और फिर बुखार आते वक्‍त नहीं लगता। इन सबके बावज़ूद उसे ग़लत बातों से समझौता करना कतई स्‍वीकार नहीं है और न ही यह उसकी फितरत में है। वह कोई भी काम मजबूरी में नहीं करती। वह जो भी काम करती है, दिल लगाकर करती है और अपनी पूरी जान लड़ा देती है। शुभि को सकारात्मक सोच के लोगों से दोस्‍ती करने और निभाने में खूब मज़ा आता है। पर उसे ऐसे बहुत कम दोस्‍त मिले हैं जो उसके मन-मस्तिष्क के इस टुकड़े को संतुष्‍ट कर सकें।

शुभि के इस तरह के व्‍यवहार से प्रणव ख़ासे नाराज़ हो जाते हैं। शुभि उनसे निरीह बच्‍चो की तरह पूछती है कि आखिर उसका कुसूर क्‍या है? क्‍या वह चिड़िया की तरह पंख फैलाकर उड़ने की कल्‍पना मात्र से खुश नहीं हो सकती? बीते बचपन को फिर से जीना अपराध है? वह प्रणव की तरह गंभीरता और चुप्‍पी का मुखौटा लगाकर नहीं जी सकती। उसका दम घुटता हे ऐसी चुप्‍पी से।

शुभि को थियेटर में फिल्‍में देखना खूब पसन्‍द है, लेकिन प्रणव इस मामले में ख़ासे कैल्कुलेटिव हैं। उनके अनुसार सी.डी. लाकर फिल्‍में घर में देखी जा सकती हैं। शुभि को लगता है कि थियेटर में फिल्‍म देखने का माहौल होता है, वहाँ चाय नहीं बनानी पड़ती, फोन नहीं उठाना पड़ता। बस प्रणव यही नहीं समझते। अब शुभि ने अकेले फिल्‍में देखना शुरू कर दिया है। वह कब तक अपने शौक मारे! ख़ासा कमाती है शुभि। उसने कभी घर परिवार की ज़िम्‍मेदारियों से मुँह नहीं मोड़ा है। लेकिन उम्र के इस पड़ाव पर शुभि निर्णय कर चुकी है कि अब वह सिर्फ़ अपने लिए जिएगी।

प्रणव शुभि में आए इस परिवर्तन से किंकर्तव्‍यविमूढ़ हैं। उन्‍होंने शुभि का यह रूप कभी नहीं देखा था। वह सच बोलने में कोई संकोच नहीं करती। उसे मज़ा आता है जब सामनेवाला उसकी बेबाक़ बातों से खासा परेशान हो जाता है और वह शुभि के न बोलने में ही सबकी भलाई समझता है। कई बार शुभि को सच बोलने की ख़ासी कीमत भी चुकानी पड़ती है। जो रिश्‍तेदार शुभि की तारीफ़ करते नहीं थकते थे वे उसकी सच बातें सुनकर उससे ख़फा हो गए हैं। शुभि तब बहुत रिसिया जाती है जब कोई उसकी मजबूरी नहीं समझता।

शुभि के सभी रिश्‍तेदार एक बार फिर मुंबई घूमना चाहते हैं। शुभि ने सिर्फ़ इतना भर कहा कि जब भी आएँ, बताकर आएँ ताकि वह छुटिटयों का जुगाड़ कर सके। वे तथाकथित रिश्‍तेदार शुभि की इसी बात का बुरा मान गए और वैष्‍णोदेवी चले गए। यह भी कोई बुरा मानने वाली बात है भला? सबसे मज़ेदार बात यह होती है कि प्रणव भी अपने रिश्‍तेदारों की तरफ़ हो जाते हैं और शुभि को अकेला कर देते हैं। यह मोर्चा शुभि को अकेले सँभालना होता है। प्रणव को पता है कि मुंबई की ज़िन्‍दगी में कितनी भागदौड़ और संघर्ष है। शुभि को भी आराम की ज़रूरत है। उसकी उम्र का भी तकाज़ा है कि उसे अब कोई तक़लीफ़ न दे और अपनी ज़िन्‍दगी जीने दे। शुभि कभी किसी की निजी ज़िन्‍दगी में दखल नहीं देती। न उसे पसन्‍द है कि कोई उसकी ज़िन्‍दगी में दखल दे। उसने बहुत संघर्ष करके अपने लिए ये आराम के क्षण जुटाए हैं जिन पर सिर्फ़ उसका और उसका अधिकार है।

शुभि ने हड़बड़ाकर घड़ी देखी तो चौंक गई कि शाम के छह बज रहे हैं। वह नहाई तक नहीं है, खाने तक की सुध नहीं रही उसे। लेकिन आज दिनभर उसने छोटी-छोटी बातों के उन रेशों को पकड़ने की कोशिश की है तो उसे परेशान करते हैं, बेचैन करते हैं, रातों की नींद उड़ा देते हैं। आज शुभि ने अपने लिए उस आज़ादी को पूरी शिद्दत से महसूस किया हे जिसके लिए हर स्‍त्री तड़पती है। शुभि अंगड़ाई लेकर बदन की सुस्‍ती को दूर करती है और फुर्ती से किचन की तरफ़ चल देती है। आज शुभि ने निर्णय ले लिया है कि प्रणव की तरह उसे भी अपनी तरह से ज़िन्‍दगी जीने का मूलभूत अधिकार है और वह बाक़ायदा इसका इस्‍तेमाल करेगी। अचानक ही उसके मुँह से यह गाना निकल पड़ा,
''पंछी बनूँ, उड़ती फिरूँ मस्‍त गगन में...''

 

 


Mayank Rai

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